देश में लगातार बढ़ रहे बस हादसों और आग की घटनाओं ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को गंभीर चिंता में डाल दिया है। इसी कारण आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र भेजकर स्पष्ट किया कि सार्वजनिक परिवहन बसों में हो रहे खतरनाक डिजाइन बदलाव सीधे तौर पर यात्रियों की सुरक्षा और उनके जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हैं। आयोग के अनुसार, सबसे बड़ा जोखिम उन बसों में है जिनमें ड्राइवर का केबिन यात्रियों से पूरी तरह अलग बना दिया जाता है, जिससे आपात स्थिति में संवाद और बचाव बेहद मुश्किल हो जाता है।
शिकायतों में बताया गया कि कई हादसों में आग लगने के बाद ड्राइवर और यात्रियों के बीच समन्वय न होने से जान बचाना कठिन हो गया। आयोग ने इन घटनाओं को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार पर सीधा हमला बताया। इसी आधार पर एनएचआरसी ने संरक्षण मानवाधिकार अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत संज्ञान लिया और परिवहन मंत्रालय व केंद्रीय सड़क परिवहन संस्थान (CIRT) से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांग ली।
CIRT द्वारा की गई जांच में जो खुलासे हुए, वे हालात की गंभीरता दिखाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, हादसे वाली बस में बॉडी निर्माण के दौरान कई नियमों का खुला उल्लंघन किया गया था। स्लीपर बसों में ड्राइवर पार्टिशन डोर लगाना प्रतिबंधित है, फिर भी यह लगाया गया था। इसके अलावा 12 मीटर से लंबी बसों में कम से कम पाँच आपात निकास अनिवार्य होते हैं, लेकिन बस में इतनी बुनियादी सुविधा भी नहीं थी। सबसे चिंताजनक बात यह रही कि 2019 से अनिवार्य फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम (FDSS) भी बस में नहीं लगाया गया था। कुछ हिस्से जैसे स्लीपर कोच स्लाइडर और चेसिस एक्सटेंशन बिना अनुमति के जोड़े गए थे, जो सीधे दुर्घटना के जोखिम को बढ़ाते हैं।
CIRT ने अपनी रिपोर्ट में पार्टिशन हटाने, अनिवार्य FDSS लगाने, 10 किलो के फायर एक्सटिंग्विशर की नियमित जांच और बस बॉडी मानकों का सख्त पालन सुनिश्चित करने की सिफारिश की है। आयोग ने भी स्पष्ट कहा कि 14 अक्टूबर को हुई आग की घटना नियमों की घोर अनदेखी और गंभीर लापरवाही का परिणाम थी। इसमें बस निर्माता, बॉडी बिल्डर और फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करने वाले अधिकारी सभी दोषी हैं। आयोग ने इसे आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में रखा है।
एनएचआरसी ने सड़क परिवहन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह सभी राज्यों को बस सुरक्षा नियमों के कड़े पालन के लिए एडवाइजरी जारी करे और एक राष्ट्रीय स्तर का मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करे, ताकि भविष्य में कोई भी बस ऑपरेटर या बॉडी बिल्डर सुरक्षा मानकों से बच न सके। सभी राज्यों को CIRT की सिफारिशें तुरंत लागू करने, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने और पीड़ितों को उचित मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। राज्यों से दो सप्ताह के भीतर एक्शन-टेकन रिपोर्ट भी मांगी गई है।
यह कदम स्पष्ट करता है कि बसों की असुरक्षित डिजाइन अब केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि सीधी मानवाधिकार समस्या मानी जा रही है। यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अगले कुछ हफ्ते राज्यों की कार्रवाई की परीक्षा होंगे।











