सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि भारतीय कानून के तहत ‘काजी की अदालत’, ‘दारुल कजा’ या ‘शरिया कोर्ट’ जैसे किसी भी धार्मिक न्यायिक निकाय को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की संयुक्त पीठ ने एक महिला की याचिका पर विचार करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले से संबंधित था, जिसमें फैमिली कोर्ट ने ‘काजी की अदालत’ में किए गए समझौते के आधार पर निर्णय दिया था।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे धार्मिक निकायों के निर्णय केवल उन पक्षों पर लागू हो सकते हैं जो स्वेच्छा से उनका पालन करने के लिए सहमत हों। हालांकि, इन्हें कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने 2014 के ऐतिहासिक विश्व लोचन मदन बनाम भारत सरकार के मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें शरिया अदालतों और फतवों की कानूनी अमान्यता की पुष्टि की गई थी।
प्रकरण में, महिला का विवाह 2002 में इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। 2005 और 2009 में विभिन्न धार्मिक न्यायिक निकायों में तलाक के मामले चले। 2008 में महिला ने भरण-पोषण की मांग की, जिसे फैमिली कोर्ट ने पहले खारिज कर दिया।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को पलटा और पति को निर्देशित किया कि वह पत्नी को मासिक 4,000 रुपए भरण-पोषण का भुगतान करे।
यह निर्णय भारत में धार्मिक न्यायिक निकायों की कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।