बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास दोनों पद एक साथ रखने का कोई संवैधानिक रास्ता नहीं बचा। भारतीय संविधान और लोक प्रतिनिधित्व कानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक साथ संसद और राज्य विधानमंडल दोनों का सदस्य नहीं रह सकता। सांसद बनने के बाद 14 दिनों के भीतर पुराना पद छोड़ना अनिवार्य है।
सूत्रों के मुताबिक नीतीश कुमार को 30 मार्च तक बिहार विधान परिषद (MLC) की सदस्यता छोड़नी होगी, नहीं तो उनकी राज्यसभा सदस्यता प्रभावित हो सकती है। उनका राज्यसभा कार्यकाल 10 अप्रैल से शुरू होने की संभावना है, जिससे पहले या उसी समय के आसपास वे मुख्यमंत्री पद भी छोड़ सकते हैं।
नीतीश के बाद एनडीए में नए मुख्यमंत्री को लेकर चर्चा तेज हो जाएगी। भाजपा, जदयू और सहयोगी दल मिलकर नया नेता तय करेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश की पसंद ही अगला मुख्यमंत्री तय करेगी। अप्रैल के दूसरे हफ्ते तक तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर बेहद रोचक रहा है। पिछले करीब 20 साल से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे ‘सुशासन बाबू’ 9 बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं। उन्होंने पिछले एक दशक से कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा, फिर भी सत्ता की कमान थामे रखी। अब जब बिहार की बागडोर किसी और के हाथ जाएगी, तो एक युग का अंत होगा।










