पश्चिमी एशिया में चल रहे भीषण तनाव और युद्ध की लपटों के बीच एक बार फिर भारत और ईरान के रिश्तों की गहराई दुनिया के सामने आई है। जब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं और अमेरिका व इजरायल के साथ ईरान का संघर्ष चरम पर है, तब तेहरान ने भारत को एक ‘सच्चा और भरोसेमंद दोस्त’ बताते हुए भारतीय जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने का फैसला किया है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, इस संकट काल में होर्मुज की खाड़ी से गुजरने वाले विदेशी जहाजों में सबसे बड़ी संख्या भारत की रही है। ईरान के इस कदम ने न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित किया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह संदेश भी दिया है कि संकट के समय पुराने दोस्त ही काम आते हैं।
ईरानी राजदूत मोहम्मद फताली ने हाल ही में नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भारत की जमकर तारीफ की। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान और भारत का भाग्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और इस मुश्किल घड़ी में भारत ने एक ‘सहानुभूतिपूर्ण साथी’ की भूमिका निभाई है। जहाँ एक तरफ अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाने के लिए होर्मुज की खाड़ी में सख्त घेराबंदी (Blockade) कर दी है, वहीं ईरान ने भारत, चीन और रूस जैसे मित्र राष्ट्रों के जहाजों को बिना किसी बाधा के निकलने की अनुमति दी है। अब तक आठ से ज्यादा भारतीय एलपीजी और कच्चे तेल के टैंकर, जिनमें ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ जैसे बड़े जहाज शामिल हैं, सुरक्षित रूप से भारतीय बंदरगाहों तक पहुँच चुके हैं। यह भारत के लिए बड़ी राहत की बात है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है।
हालांकि, इस पूरी स्थिति ने एक बड़ा कूटनीतिक सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका की नीतियों ने भारत को एक अनचाहे जाल में फंसा दिया है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा शुरू किए गए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और उसके बाद ईरान पर लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने भारत के लिए संतुलन बनाना मुश्किल कर दिया है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी जहाज ईरान को किसी भी तरह का शुल्क (Toll) देंगे, उन पर कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में भारत के सामने एक तरफ अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को बचाने का दबाव। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के इस आक्रामक रुख ने वैश्विक व्यापारिक गलियारों में अस्थिरता पैदा कर दी है, जिससे भारत जैसे तेल आयातक देशों पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है।
फिलहाल, भारत अपनी कूटनीतिक कुशलता का परिचय देते हुए दोनों पक्षों के बीच रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है। विदेश मंत्रालय और नौवहन मंत्रालय लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं ताकि भारतीय नाविक और जहाज सुरक्षित रहें। ईरान का यह दोस्ताना रवैया भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है, क्योंकि जब दुनिया के कई देश ईरान से दूरी बना रहे हैं, तब भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को कायम रखते हुए अपने हितों की रक्षा की है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका अपने रुख में कुछ नरमी लाता है या फिर भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस और ईरान जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करना पड़ता है।










