नई दिल्ली: धार्मिक भावनाओं और आस्था के नाम पर फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रोकने की राज्य सरकारों की कोशिशों पर देश की शीर्ष अदालत ने एक बेहद बड़ा और कड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म ‘महाप्रभु जगन्नाथ’ की रिलीज पर तुरंत रोक लगाने की मांग करने वाली ओडिशा सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) को कड़ाई से खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने दोटूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने सभी पहलुओं की गहन जांच के बाद फिल्म को प्रमाण पत्र जारी कर दिया है, तो राज्य सरकार बिना किसी ठोस आधार के इसकी रिलीज में अड़ंगा नहीं डाल सकती।
न्यायिक कार्यवाही से मिले आधिकारिक इनपुट्स के मुताबिक, ओडिशा सरकार ने याचिका दाखिल कर तर्क दिया था कि फिल्म के कुछ दृश्यों और संवादों से महाप्रभु जगन्नाथ के करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हो सकती हैं और राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का गंभीर खतरा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस तर्क को सिरे से नकारते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है, न कि सेंसर बोर्ड द्वारा प्रमाणित किसी फिल्म की रिलीज को रोकना। अदालत ने यह भी कड़ा आदेश दिया कि रिलीज के दिन सिनेमाघरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य पुलिस की जिम्मेदारी होगी।
शीर्ष अदालत का यह कड़ा और पारदर्शी फैसला उन राजनीतिक टूलकिट सिंडिकेट्स और कट्टरपंथियों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है, जो अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने और सिनेमाघरों के बाहर हंगामा खड़ा करने की धमकियां देते हैं। ‘नेशन First’ (Nation First) के संवैधानिक सिद्धांतों और न्यायिक प्रक्रिया की ‘बेंच स्ट्रेंथ’ पर भरोसा जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाई है। इस लैंडमार्क फैसले के बाद फिल्म निर्माता और वितरक अब पूरे देश में फिल्म को प्रदर्शित करने के लिए पूरी तरह से फ्रंट-फुट पर आ चुके हैं।










