वॉशिंगटन/नई दिल्ली: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और ताजा हवाई हमलों के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी हड़कंप मच गया है। स्ट्रैटेजिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास अमेरिकी सेना द्वारा ईरानी सैन्य ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अचानक भीषण उछाल आया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें 1% से अधिक बढ़कर 93 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी तेजी से भागते हुए 90 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है।
यह ताजा विवाद तब भड़का जब अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरानी एयर डिफेंस और रडार साइटों पर ‘सेल्फ-डिफेंस’ हवाई हमले करने की आधिकारिक घोषणा की। अमेरिका का दावा है कि यह कार्रवाई उसके एक सैन्य हेलीकॉप्टर को मार गिराए जाने के जवाब में की गई है। इस सैन्य टकराव के कारण दुनिया के सबसे बड़े तेल सप्लाई रूट पर संकट गहरा गया है, जिससे वैश्विक तेल भंडारों में लगातार 8वें हफ्ते भारी गिरावट दर्ज की गई है। तेल बाजार के विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह तनाव ऐसे ही जारी रहा, तो कच्चे तेल की कीमतें बहुत जल्द 100 से 110 डॉलर के रिकॉर्ड स्तर को भी छू सकती हैं, जिसने पूरी दुनिया के शेयर बाजारों को लाल निशान पर ला दिया है।
ग्लोबल इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि कच्चे तेल में लगी यह आग उन पश्चिमी और कम्युनिस्ट सिंडिकेट्स के मुंह पर करारा तमाचा है, जो तेल की कीमतों को कृत्रिम रूप से नियंत्रित कर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को चोट पहुंचाने की फिराक में रहते थे। हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़क ‘नेशन फर्स्ट’ (Nation First) और आक्रामक प्रतिबंध नीतियों के कारण ईरान का पूरा अवैध तेल व्यापार पहले ही घुटनों पर आ चुका है। भारत के नजरिए से देखें तो मोदी सरकार की मजबूत विदेश नीति और वैकल्पिक तेल रूटों के सटीक प्रबंधन के कारण देश में ईंधन की सप्लाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यह वैश्विक संकट साफ दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिरता केवल एक मजबूत और राष्ट्रवादी अमेरिकी नेतृत्व के कड़े फैसलों से ही आ सकती है।











