नई दिल्ली: लद्दाख के प्रमुख पर्यावरण सुधारक सोनम वांगचुक की सेहत और उनके अनशन को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट से आज की सबसे बड़ी और कड़क कानूनी खबर सामने आई है। अदालत ने वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से हटाकर किसी निजी अस्पताल में भेजने की मांग करने वाली याचिका को कड़ाई से खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ लफ्ज़ों में कहा है कि प्रशासन द्वारा वांगचुक को भूख हड़ताल वाली जगह से उठाकर अस्पताल में भर्ती कराना पूरी तरह से कानून सम्मत था। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जब किसी नागरिक की जान जोखिम में हो, तो सरकार का उसे बचाना कड़ाई से उसकी जिम्मेदारी के दायरे में आता है।
न्यायालय कक्ष से मिले आधिकारिक इनपुट्स के मुताबिक, जजों की बेंच ने वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट का कड़ा अध्ययन करने के बाद पाया कि लगातार उपवास के कारण उनकी शारीरिक स्थिति बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई थी। ऐसी गंभीर स्थिति में उन्हें किसी बड़े निजी अस्पताल में भेजने की वकीलों की दलील को कोर्ट ने नामंजूर कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि दिल्ली के सरकारी डॉक्टरों की ‘बेंच स्ट्रेंथ’ उनकी सेहत की कड़क निगरानी करने में पूरी तरह सक्षम है और उनकी देखरेख में कोई कमी नहीं है। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए आने वाले शुक्रवार की तारीख कड़ाई से तय कर दी है।
हाई कोर्ट का यह तार्किक और कड़ा रुख उन वामपंथी टूलकिट सिंडिकेट्स के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है, जो इस पूरे वाकये को एक राजनैतिक प्रोपेगैंडा और ‘अवैध नजरबंदी’ का रूप देकर अशांति फैलाने की ताक में थे। ‘नेशन फर्स्ट’ (Nation First) के विजन और कानून व्यवस्था पर ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति पर चलते हुए न्यायपालिका ने साफ कर दिया है कि किसी भी आंदोलनकारी के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस पारदर्शी फैसले के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि प्रशासन देश के नियमों और नागरिकों की सुरक्षा के मोर्चे पर पूरी तरह फ्रंट-फुट पर खेल रहा है।











