चेन्नई: छात्रों के राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में भाग लेने को लेकर जारी किए गए एक विवादास्पद प्रशासनिक आदेश को भारी विरोध और चौतरफा दबाव के बाद वापस ले लिया गया है। प्रारंभिक सर्कुलर में छात्रों को विशेष रूप से राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों और आंदोलनों से दूर रहने की सख्त हिदायत दी गई थी, जिसे लेकर विभिन्न छात्र संगठनों, शिक्षक संघों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने कड़ा ऐतराज जताया था।
आदेश जारी होते ही शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक हलकों में तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली। आलोचकों और छात्र नेताओं ने इसे छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करार दिया। उनका तर्क था कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले युवाओं को देश और समाज के नीतिगत मुद्दों पर अपनी राय रखने और शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन में भाग लेने का संवैधानिक अधिकार है, जिस पर इस तरह के प्रतिबंध लगाना अनुचित है।
बढ़ते विवाद और जनआक्रोश को देखते हुए उच्चाधिकारियों ने मामले की समीक्षा की और औपचारिक रूप से सर्कुलर को निरस्त करने की घोषणा की। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि परिसरों में शैक्षणिक माहौल और कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता है, लेकिन छात्रों के वैध अधिकारों को सीमित करने का कोई इरादा नहीं था। आदेश वापस लिए जाने के बाद छात्र संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत बताते हुए सामान्य शैक्षणिक गतिविधियों को जारी रखने की बात कही है।











