वाशिंगटन: ईरान में जारी अमेरिकी सैन्य अभियानों के बीच वाशिंगटन के शीर्ष राजनीतिक हलकों में एक बहुत बड़ा कड़ा रणनीतिक मोड़ आ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति को बड़ा झटका देते हुए अमेरिकी सीनेट (US Senate) ने राष्ट्रपति के ‘युद्ध अधिकारों’ (War Powers Resolution) को सीमित करने का ऐतिहासिक प्रस्ताव कड़ाई से पास कर दिया है। 50-48 के कड़े अंतर से पारित हुए इस प्रस्ताव में कड़ा आदेश दिया गया है कि जब तक अमेरिकी कांग्रेस (संसद) से मंजूरी या युद्ध की औपचारिक घोषणा नहीं होती, तब तक राष्ट्रपति बिना संसदीय अनुमति के ईरान के खिलाफ एकतरफा सैन्य कार्रवाई जारी नहीं रख सकते।
कैपिटल हिल से मिले आधिकारिक इनपुट्स के मुताबिक, इस वोटिंग के दौरान सत्ताधारी पार्टी के चार वरिष्ठ सांसदों (सुसैन कॉलिन्स, लिसा मुर्कोव्स्की, बिल कैसिडी और रैंड पॉल) ने पार्टी लाइन को तोड़कर प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसने व्हाइट हाउस के रणनीतिक खेमे में हड़कंप मचा दिया है। इस प्रस्ताव का मूल उद्देश्य बिना संसदीय स्वीकृति के मनमाने सैन्य फैसलों को कड़ाई से रोकना है। सीनेट में गूंजी इस आवाज ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी जन प्रतिनिधि अब इस महंगे और अनिश्चित विदेशी युद्ध में अपनी संवैधानिक निगरानी (Constitutional Oversight) की ‘बेंच स्ट्रेंth’ को पूरी तरह री-स्टोर करना चाहते हैं।
सीनेट का यह कड़ा और ऐतिहासिक फैसला उन रक्षा विश्लेषकों और रिपब्लिकन रणनीतिकारों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है, जो मानते थे कि राष्ट्रपति ट्रंप के फैसलों को संसद में बिना किसी सवाल के स्वीकार कर लिया जाएगा। ‘नेशन First’ (Nation First) और अमेरिकी संविधान की गरिमा का हवाला देते हुए प्रस्ताव के समर्थकों ने साफ कर दिया है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति के तहत कोई भी राष्ट्रपति संसद को दरकिनार करके देश को लंबे युद्ध में नहीं झोंक सकता। संसद द्वारा दिए गए इस कड़े और पारदर्शी झटके के बाद अब ट्रंप प्रशासन को अपनी ईरान नीति और सैन्य अधिकारों के कानूनी आधार पर पूरी तरह से फ्रंट-फुट पर आकर जवाब देना होगा।











