जब भारत मध्य पूर्व संकट के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा को साधने में लगा है, तो उसके पश्चिमी पड़ोसी पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं। पंप पर लगी कीमतों ने आम पाकिस्तानी की कमर तोड़ दी है और एक पहले से लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को और गहरे संकट में धकेल दिया है। विडंबना यह है कि इस्लामाबाद की यह तकलीफ नई दिल्ली के लिए चुपचाप एक अनुकूल परिस्थिति बना रही है।
पाकिस्तान में ईंधन की कीमतों में यह उछाल अचानक नहीं आया। कमजोर होता पाकिस्तानी रुपया, तेजी से घटते विदेशी मुद्रा भंडार और कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भरता ने मिलकर एक विस्फोटक स्थिति पैदा की है। IMF की शर्तों के दबाव में पाकिस्तान सरकार को ईंधन सब्सिडी वापस लेनी पड़ी जिससे महंगाई ने जनता की जेब पर भारी बोझ डाल दिया।
दूसरी तरफ भारत इस पूरे घटनाक्रम को एक मजबूत स्थिति से देख रहा है। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार, 41 देशों से विविध आयात और स्थिर रुपये के जरिए भारत ने इस झटके को काफी हद तक संभाल लिया है। भू-राजनीतिक नजरिये से देखें तो आंतरिक आर्थिक उथल-पुथल में उलझा पाकिस्तान क्षेत्रीय स्तर पर अपना प्रभाव दिखाने में कम सक्षम होता है।
इसके अलावा जब पाकिस्तान ऊर्जा असुरक्षा से जूझ रहा है, भारत चुपचाप अपना ऊर्जा ढांचा मजबूत कर रहा है — रिफाइनरी क्षमता बढ़ा रहा है, घरेलू गैस उत्पादन को प्रोत्साहन दे रहा है और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। पाकिस्तान का पंप संकट एक याद दिलाता है कि भू-राजनीति में भी स्थिरता अपने आप में एक बड़ी ताकत होती है।











