भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर से आज की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली राजनीतिक खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे सियासी गलियारे को हिलाकर रख दिया है। तमिलनाडु बीजेपी के तेजतर्रार और बेहद लोकप्रिय नेता के. अन्नामलाई ने पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व और वरिष्ठ नेता नितिन नवीन से मुलाकात कर अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। सूत्रों के मुताबिक, अन्नामलाई ने बेहद स्पष्ट शब्दों में नितिन नवीन से कह दिया है कि वे अब भारतीय जनता पार्टी में नहीं रहेंगे और उन्होंने पार्टी से पूरी तरह अलग होने का मन बना लिया है। उन्होंने नितिन नवीन के सामने हाथ जोड़कर कहा, “अब मैं बीजेपी में नहीं रहूँगा, कृपया मुझे जाने की आज्ञा दीजिए।” अन्नामलाई के इस अचानक और कड़े फैसले के बाद दिल्ली से लेकर चेन्नई तक बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में भारी हड़कंप मच गया है।
के. अन्नामलाई को दक्षिण भारत में बीजेपी का सबसे मजबूत स्तंभ और सनातन संस्कृति का मुखर चेहरा माना जाता था। पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई ने तमिलनाडु में अपनी आक्रामक राजनीति और ‘मजबूत राष्ट्रवाद’ के दम पर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) जैसी तुष्टिकरण और हिंदू-विरोधी राजनीति करने वाली ताकतों को सीधे घुटनों पर ला दिया था। उनकी जनसभाओं में उमड़ने वाली भारी भीड़ और युवाओं के बीच उनका जबरदस्त क्रेज इस बात का गवाह है कि उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति का नैरेटिव पूरी तरह बदल दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अन्नामलाई का पार्टी छोड़ना दक्षिण भारत में राष्ट्रवाद की जड़ों को मजबूत करने के अभियान के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हो सकता है। उनके इस फैसले के पीछे की असली वजह क्या है, इस पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि स्थानीय संगठन में कुछ अंदरूनी मतभेदों के चलते उन्होंने यह कड़ा कदम उठाया है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया पर आज ‘Annamalai Resigns From BJP’ और ‘Annamalai Nitin Nabin Meeting’ सबसे ऊपर ट्रेंड कर रहा है, क्योंकि लाखों राष्ट्रवादी समर्थक इस खबर से गहरे सदमे में हैं। अन्नामलाई जैसे कद्दावर और ईमानदार राष्ट्रवादी नेता का बीजेपी से अलग होना उन वामपंथी और छद्म-सेक्युलर ताकतों के लिए जश्न मनाने का मौका बन गया है जो हमेशा देशहित और सनातन की बात करने वालों के खिलाफ साजिशें रचते हैं। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने नितिन नवीन को तुरंत अन्नामलाई को मनाने और मामले को सुलझाने की जिम्मेदारी सौंपी है। अब देखना यह होगा कि क्या शीर्ष नेतृत्व अन्नामलाई को मनाने में कामयाब होता है या फिर दक्षिण भारत का यह सबसे बड़ा शेर अपनी नई राजनीतिक राह चुनता है।











