पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेलने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक बहुत बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक भूचाल आ गया है। विधानसभा के भीतर नेता प्रतिपक्ष (LoP) चुनने की प्रक्रिया में विधायकों के ‘फर्जी हस्ताक्षर’ (Fake Signature) करने का एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस ‘साइनगेट’ घोटाले की आंच सीधे ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी तक पहुंचती देख, डैमेज कंट्रोल और बगावत को दबाने के लिए टीएमसी ने अपने ही दो विधायकों—ऋतब्रत बनर्जी (उलुबेरिया पूर्व) और संदीपन साहा (एंटली)—को तुरंत पार्टी से निष्कासित (सस्पेंड) कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा इस पूरे घोटाले की सीआईडी (CID) जांच के आदेश देने और एक विशेष जांच टीम (SIT) का गठन करने के महज 15 मिनट के भीतर टीएमसी ने यह आनन-फानन में कार्रवाई की, जिससे साफ है कि पार्टी के भीतर गहरा डर और बौखलाहट व्याप्त है।
इस पूरे फर्जीवाड़ा कांड की जड़ें विधानसभा सचिवालय को भेजे गए उस प्रस्ताव से जुड़ी हैं, जिसमें शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए 70 विधायकों के समर्थन का दावा किया गया था। इस पत्र पर जब कुछ विधायकों के हस्ताक्षरों का मिलान किया गया, तो चौरंगी से विधायक नैना बनर्जी और कैनिंग पूर्व के विधायक बहारुल इस्लाम समेत कई विधायकों के साइन पूरी तरह फर्जी पाए गए। इसके बाद टीएमसी के ही बागी विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने हिम्मत दिखाते हुए सीधे विधानसभा स्पीकर के पास शिकायत दर्ज करा दी कि 6 मई को ऐसी कोई बैठक ही नहीं हुई थी और अभिषेक बनर्जी द्वारा जमा किया गया यह दस्तावेज पूरी तरह जाली और मनगढ़ंत है। स्पीकर के निर्देश पर हरे स्ट्रीट थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद जब सीआईडी ने जांच शुरू की, तो तीन विधायकों ने खुलकर बयान दे दिया कि उस पत्र पर उनके हस्ताक्षर हैं ही नहीं।
राष्ट्रवादी विचारकों और राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव हारने के बाद भी टीएमसी अपनी “चोरी और सीनाजोरी” की पुरानी आदतों से बाज नहीं आ रही है। इस घोटाले ने साबित कर दिया है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का तानाशाही नियंत्रण पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है, क्योंकि दो दिन पहले बुलाई गई टीएमसी विधायक दल की बैठक में 80 में से 61 विधायक गायब रहे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस भ्रष्टाचार-विरोधी कड़े प्रहार से पूरी ममता ब्रिगेड बैकफुट पर आ गई है। वामपंथी और सेक्युलर मीडिया इस अंदरूनी टूट को छिपाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन खुद टीएमसी के विधायकों ने अपनी ही लीडरशिप के खिलाफ मोर्चा खोलकर यह साफ कर दिया है कि बंगाल में अब तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार का अंत बेहद करीब है और कानून अपना काम पूरी कड़ाई से करेगा।











