पुरी/नई दिल्ली: सनातन संस्कृति और आस्था के सबसे भव्य प्रतीक, विश्व प्रसिद्ध ‘पुरी रथ यात्रा 2026’ (Puri Rath Yatra 2026) का पावन शंखनाद हो चुका है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के शुभ अवसर पर ओडिशा के पुरी धाम में महाप्रभु जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथों की भव्य यात्रा निकाली जा रही है। इस महा-महोत्सव का मुख्य कारण और आध्यात्मिक संदेश यह है कि भगवान जगन्नाथ हर साल अपने मुख्य मंदिर के गर्भगृह को छोड़कर अपनी मौसी के घर ‘गुंडीचा मंदिर’ (Gundicha Temple) जाते हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह ईश्वर और भक्त के बीच के उस अटूट प्रेम का जीवंत प्रमाण है जहां जाति, धर्म और वर्ग की दूरियां पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं।
शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, महाप्रभु जगन्नाथ के भीड़ के बीच साक्षात सड़क पर आने का एक कड़ा और सबसे सुंदर कारण है। गर्भगृह में स्थित मूर्तियों के दर्शन हर वर्ग के लोग नहीं कर पाते थे, इसलिए कृपानिधान भगवान स्वयं चलकर अपने उन भक्तों के पास आते हैं जो किसी कारणवश मंदिर के भीतर नहीं जा सकते। रथ पर सवार होकर ‘पतितपावन’ (पतितों का उद्धार करने वाले) के रूप में दर्शन देकर प्रभु यह संदेश देते हैं कि भक्ति के मार्ग में कोई वीआईपी संस्कृति या भेदभाव नहीं चलता। जनसैलाब के बीच रथ का खींचा जाना यह दर्शाता है कि मानव जीवन की डोर अंततः ईश्वर के हाथ में है, और जो भक्त निश्छल मन से प्रभु के रथ की रस्सी को छू भी लेता है, उसके जन्म-जन्मांतर के पाप कड़ाई से नष्ट हो जाते हैं।
यह भव्य और पारदर्शी सनातनी आस्था उन वामपंथी टूलकिट सिंडिकेट्स और पश्चिमी विचारकों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है, जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं को रूढ़िवादिता का नाम देकर बदनाम करने का प्रोपेगैंडा फैलाते हैं। ‘नेशन फर्स्ट’ (Nation First) के तहत पुरी धाम के विकास और सुरक्षा की ‘बेंच स्ट्रेंथ’ को इस बार रिकॉर्ड स्तर पर अपग्रेड किया गया है, जिससे लाखों श्रद्धालु बिना किसी व्यवधान के दर्शन कर रहे हैं। मंदिर के राजा द्वारा सोने की झाड़ू से रथ के सामने रास्ता साफ करने (छेरा पहरा रस्म) की कड़क परंपरा यह सिखाती है कि भगवान के सामने हर इंसान, चाहे वह राजा हो या रंक, पूरी तरह समान है।











