वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवन रेखा माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर ईरान ने एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा फैसला किया है। सोमवार, 18 मई 2026 को ईरान की शीर्ष सुरक्षा संस्था ने इस रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने वाले समुद्री जहाजों को नियंत्रित और विनियमित करने के लिए एक नई अथॉरिटी—‘पर्सियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी’ (PGSA)—के गठन की आधिकारिक घोषणा की है। ईरान के संसदीय सुरक्षा पैनल के अध्यक्ष इब्राहिम अजीजी और विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस नई व्यवस्था के तहत अब होर्मुज की खाड़ी से गुजरने वाले सभी वाणिज्यिक जहाजों को विशेष सेवाओं के बदले ‘टोल टैक्स’ (Transit Fee) देना होगा। इसके अलावा, अब किसी भी जहाज को इस मार्ग से गुजरने के लिए पहले ईमेल (info@PGSA.ir) के जरिए अपनी ओनरशिप, बीमा, क्रू मेंबर्स और कार्गो की पूरी जानकारी साझा कर ‘ट्रांजिट परमिट’ लेना अनिवार्य कर दिया गया है।
ईरान की इस नई समुद्री नीति ने वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय बाजार में हड़कंप मचा दिया है। ईरान ने साफ संकेत दिए हैं कि यह नई व्यवस्था सभी देशों के लिए समान नहीं होगी। इस कड़े कानून का पूरा लाभ केवल उन्हीं देशों और जहाजों को मिलेगा जो ईरान के साथ सहयोगात्मक संबंध रखते हैं। इसके विपरीत, ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रज़ा आरिफ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि दुश्मन देशों (विशेष रूप से अमेरिका और इजरायल) से जुड़े या उनके लिए सैन्य उपकरण ले जाने वाले जहाजों को इस मार्ग से गुजरने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जाएगी और उन पर सख्त पाबंदियाँ लागू होंगी। ओमान के साथ मिलकर तैयार की जा रही इस नई व्यवस्था को विशेषज्ञ अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों (खासकर फ्रीडम ऑफ नेविगेशन) का उल्लंघन मान रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ जहाजों से पहले ही चीनी युआन (Yuan) में भारी-भरकम टोल वसूला जा चुका है।
इस कदम से वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने और खाड़ी क्षेत्र में सैन्य तनाव चरम पर पहुँचने की आशंका काफी गहरी हो गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है, ऐसे में इस मार्ग पर ईरान का कड़ा नियंत्रण और अमेरिकी सैन्य अड्डों की मेजबानी करने वाले खाड़ी देशों (यूएई और कुवैत) को दी गई सीधी चेतावनियाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को घेरने वाले नक्शे साझा करने और अमेरिकी ट्रेजरी (OFAC) द्वारा इस नए टोल सिस्टम के खिलाफ प्रतिबंधों की चेतावनी दिए जाने के बाद, पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और भारत जैसे प्रमुख तेल आयातक देश इस नई समुद्री व्यवस्था और भू-राजनीतिक संकट से कैसे निपटते हैं।











