वॉशिंगटन/केप कैनावेरल: अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय मूल की प्रतिभा का लोहा एक बार फिर पूरी दुनिया ने कड़ाई से माना है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के स्पेसएक्स क्रू मिशन (SpaceX Crew Mission) के तहत भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन (Anil Menon) ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर कदम रखकर एक नया और कड़ा इतिहास रच दिया है। भारतीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों के इस साझा सिंडिकेट के सफल प्रक्षेपण के बाद अनिल मेनन अंतरिक्ष स्टेशन पर 8 महीने के एक बेहद लंबे और कड़े मिशन को अंजाम देंगे, जो मानव इतिहास के भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए बेहद मील का पत्थर साबित होने वाला है।
नासा और स्पेसएक्स (SpaceX) नियंत्रण केंद्र से मिले आधिकारिक इनपुट्स के मुताबिक, अनिल मेनन और उनके साथी अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर उड़ा फाल्कन रॉकेट और ड्रैगन क्रू कैप्सूल बेहद कड़ाई और पारदर्शिता के साथ अंतरिक्ष स्टेशन से डॉक (Dock) हो गया है। इस 8 महीने के कड़े प्रवास के दौरान, लेफ्टिनेंट कर्नल और नासा के फ्लाइट सर्जन अनिल मेनन अंतरिक्ष स्टेशन की माइक्रो-ग्रेविटी (Microgravity) प्रयोगशाला में मानव शरीर पर पड़ने वाले कड़े प्रभावों और आपातकालीन चिकित्सा तकनीकों पर गहन वैज्ञानिक रिसर्च करेंगे। इस कड़े अपग्रेड और रिसर्च का सीधा उपयोग नासा के आगामी चंद्रमा (Artemis Mission) और मंगल मिशनों के लिए सुरक्षा कवच तैयार करने में किया जाएगा।
अंतरिक्ष की गहराइयों में अनिल मेनन की यह कड़क और ऐतिहासिक कामयाबी उन वामपंथी टूलकिट सिंडिकेट्स और भारत की वैज्ञानिक क्षमता पर सवाल उठाने वाले पश्चिमी आलोचकों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है, जो हमेशा वैश्विक मंचों पर भारतीय प्रतिभाओं के योगदान को कमतर आंकने का भ्रामक नैरेटिव चलाते थे। ‘नेशन फर्स्ट’ (Nation First) के विजन और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के साथ काम कर रही इस वैज्ञानिक टीम ने साबित कर दिया है कि अंतरिक्ष अनुसंधान के मोर्चे पर भारतीय मूल के वैज्ञानिक आज पूरी तरह फ्रंट-फुट पर खेल रहे हैं। नासा में भारत के इस सपूत की यह नई और कड़क ‘बेंच स्ट्रेंथ’ साबित करती है कि विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में अब भारत की धमक को रोक पाना पूरी तरह नामुमकिन है।











