आम आदमी पार्टी (AAP) के सबसे खास रणनीतिकार और राज्यसभा सांसद संदीप पाठक का भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होना भारतीय राजनीति के सबसे बड़े झटकों में से एक माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर गहरी हैरानी है कि अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले ‘चाणक्य’ ने अचानक पाला क्यों बदल लिया। संदीप पाठक केवल एक सांसद नहीं थे, बल्कि वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के रूप में पूरी पार्टी की कार्यप्रणाली की रीढ़ माने जाते थे। उनके साथ राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और स्वाति मालीवाल समेत कुल 7 राज्यसभा सांसदों का बीजेपी में जाना न केवल एक दलबदल है, बल्कि ‘आप’ के संगठनात्मक ढांचे के पूरी तरह ढहने का संकेत है। विश्लेषक इस बात पर गौर कर रहे हैं कि पाठक का जाना केजरीवाल के लिए एक व्यक्तिगत और रणनीतिक क्षति है जिसकी भरपाई निकट भविष्य में असंभव लगती है।
संदीप पाठक की प्रोफाइल उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग बनाती है, यही वजह है कि उनकी इस चाल ने विशेषज्ञों को चकित कर दिया है। आईआईटी दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी धारक पाठक को ‘डेटा और आंकड़ों का जादूगर’ माना जाता है। उन्होंने ही पंजाब में ‘आप’ की प्रचंड जीत और दिल्ली में संगठन को बूथ स्तर पर मजबूत करने की पटकथा लिखी थी। विश्लेषकों का मानना है कि पाठक का बीजेपी के खेमे में जाना यह दर्शाता है कि आम आदमी पार्टी के भीतर वैचारिक और रणनीतिक स्तर पर एक बड़ी दरार आ चुकी है। सूत्रों के अनुसार, 2024 के लोकसभा और हालिया 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद पाठक और केजरीवाल के बीच दूरियां बढ़ने लगी थीं। पाठक की कार्यशैली और उनके द्वारा सुझाए गए उम्मीदवारों पर सवाल उठने लगे थे, जिससे उन्हें पार्टी के भीतर हाशिए पर धकेले जाने का अहसास होने लगा था।
बीजेपी के लिए संदीप पाठक का साथ मिलना किसी जैकपॉट से कम नहीं है। पाठक के पास ‘आप’ के पूरे संगठनात्मक तंत्र की गोपनीय जानकारी और चुनावी डेटा की गहरी समझ है, जिसका लाभ अब बीजेपी को पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों में अपनी पैठ जमाने में मिलेगा। इसके अलावा, 10 में से 7 सांसदों के एक साथ जाने से यह तकनीकी रूप से ‘विलय’ (Merger) की श्रेणी में आ गया है, जिससे उन पर दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई होना मुश्किल है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पाठक जैसे शांत और पर्दे के पीछे काम करने वाले रणनीतिकार का पार्टी छोड़ना यह संदेश देता है कि अब केजरीवाल के पास उन विश्वसनीय कंधों की कमी हो गई है जिन्होंने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी।
वहीं दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा और केंद्रीय एजेंसियों के डर का नतीजा बताया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि पंजाब और दिल्ली की जनता इन ‘गद्दारों’ को कभी माफ नहीं करेगी। हालांकि, विश्लेषकों का तर्क है कि अगर केवल दबाव होता तो शायद एक या दो नेता जाते, लेकिन संगठन के शीर्ष रणनीतिकार का पूरी टीम के साथ जाना पार्टी के भीतर फैले गहरे असंतोष और नेतृत्व पर अविश्वास को उजागर करता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि संदीप पाठक की ‘नंबर गेम’ वाली राजनीति बीजेपी को कितना फायदा पहुँचाती है और क्या केजरीवाल अपने खोए हुए ‘चाणक्य’ का कोई विकल्प ढूंढ पाएंगे। फिलहाल, दिल्ली की राजनीति में मचे इस ‘खेला’ ने 2029 की तैयारियों के समीकरण अभी से बदल दिए हैं।











