नई दिल्ली: ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) अभियान के तहत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को एक नए और कड़े शिखर पर ले जाते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश के सामने एक बहुत बड़ा और साहसिक विजन रखा है। नई दिल्ली में आयोजित ‘टॉय बिज़ इंटरनेशनल एग्जीबिशन 2026’ में उद्योग जगत को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने एलान किया कि भारतीय निर्माताओं को वैश्विक खिलौना बाजार की कम से कम एक-चौथाई (25%) हिस्सेदारी हासिल करने का कड़ा लक्ष्य रखना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि साल 2032 तक वैश्विक खिलौना बाजार के 179 अरब डॉलरतक पहुंचने का अनुमान है, और भारत इस विशाल बाजार पर कड़ाई से कब्जा करने की पूरी प्रशासनिक और औद्योगिक क्षमता रखता है।
वित्त मंत्री ने उद्योग जगत को केवल 5 अरब डॉलर के घरेलू बाजार तक सीमित न रहकर वैश्विक स्तर पर कड़ा विस्तार करने की नसीहत दी। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि कड़े नीतिगत सुधारों के चलते भारत के खिलौना निर्यात (Toy Exports) में भारी सुधार हुआ है और आज भारतीय खिलौने दुनिया के 153 देशों में कड़ाई से भेजे जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, घटिया क्वालिटी और डंपिंग के खिलाफ उठाए गए कड़े कदमों की बदौलत देश में खिलौनों के आयात (Imports) में 71 प्रतिशत की भारी और कड़क गिरावट दर्ज की गई है। सरकार ने साफ किया है कि अब फोकस केवल मैन्युफैक्चरिंग पर नहीं, बल्कि ‘ब्रांडिंग और इनोवेशन’ पर होना चाहिए ताकि वैश्विक खरीदार आंख बंद करके भारतीय उत्पादों पर कड़ा भरोसा कर सकें।
यह कड़ा आर्थिक रोडमैप उन वामपंथी टूलकिट सिंडिकेट्स और चीनी पैरोकारों के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है, जो लगातार भारत की मैन्युफैक्चरिंग नीतियों और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प पर झूठा प्रोपेगैंडा फैलाते थे। ‘नेशन फर्स्ट’ (Nation First) के तहत काम कर रहा केंद्रीय वाणिज्य और वित्त मंत्रालय देश को खिलौना हब बनाने के लिए 14 मंत्रालयों के साथ मिलकर ‘नेशनल Action प्लान फॉर टॉयज’ को कड़ाई से लागू कर रहा है। सरकार द्वारा आयात शुल्क को बढ़ाकर और बीआईएस (BIS) के कड़े गुणवत्ता मानक लागू करने से घरेलू इंडस्ट्री की ‘बेंच स्ट्रेंथ’ बेहद मजबूत हो चुकी है, जिससे अब खिलौना बाजार से चीनी माफिया का पूरी तरह से सफाया होना तय है।











