भारतीय राजनीति और महिला सशक्तिकरण के इतिहास में आज का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) को देशभर में लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी है। कानून मंत्रालय द्वारा जारी इस राजपत्र (Gazette) अधिसूचना के अनुसार, यह कानून 16 अप्रैल 2026 से प्रभावी माना जाएगा। इस कदम के साथ ही लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो गया है। सरकार का यह फैसला संसद के एक विशेष त्रि-दिवसीय सत्र के दौरान आया है, जिसका उद्देश्य इस ऐतिहासिक सुधार के कार्यान्वयन की बाधाओं को दूर करना और इसे आगामी आम चुनावों के लिए तैयार करना है।
इस अधिसूचना के लागू होने के साथ ही सरकार ने कार्यान्वयन की प्रक्रिया को तेज करने के लिए संसद में नए विधायी प्रस्ताव भी पेश किए हैं। पूर्व में इस कानून को जनगणना और परिसीमन (Delimitation) की लंबी प्रक्रिया से जोड़ा गया था, जिससे इसके लागू होने में 2034 तक की देरी होने की आशंका थी। हालांकि, नई रणनीति के तहत सरकार ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक, 2026 पेश किया है, जो इस आरक्षण को 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही लागू करने की अनुमति देगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में देश की संसद में एक-तिहाई महिलाएं देश के नीति-निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाती नजर आएंगी। इस बदलाव के तहत लोकसभा की कुल सीटों की संख्या भी 543 से बढ़ाकर 816 या उससे अधिक किए जाने का प्रस्ताव है, जिससे महिला सांसदों की संख्या बढ़कर 273 तक पहुँच सकती है।
राजनीतिक गलियारों में इस अधिसूचना का व्यापक स्वागत किया गया है, वहीं कुछ विपक्षी दलों ने परिसीमन के साथ इसे जोड़ने पर चिंता भी जताई है। सरकार का तर्क है कि सीटों की संख्या में वृद्धि और आरक्षण को एक साथ लागू करने से किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, बल्कि संसद का स्वरूप और अधिक समावेशी होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर कहा कि यह कानून केवल कागजी अधिकार नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी के आत्मविश्वास को नई उड़ान देने वाला संकल्प है। इस कानून के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए भी आरक्षित सीटों के भीतर ही 33 प्रतिशत कोटा सुनिश्चित किया गया है। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी केवल 14% के करीब है, जो इस कानून के पूर्ण कार्यान्वयन के बाद वैश्विक मानकों के करीब पहुँच जाएगी।
प्रशासनिक स्तर पर, परिसीमन आयोग के गठन की तैयारी शुरू हो चुकी है, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश करेंगे। यह आयोग निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण और महिला उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होने वाली विशिष्ट सीटों की पहचान करेगा। यह आरक्षण फिलहाल 15 वर्षों के लिए लागू किया गया है, जिसे संसद आगे बढ़ाने का अधिकार रखती है। इस अधिसूचना ने दशकों से लंबित पड़े इस सुधार को वास्तविकता में बदल दिया है, जिससे न केवल राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी बल्कि सामाजिक बदलाव की गति भी तेज होगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि परिसीमन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शिता के साथ पूरी होती है और 2029 में भारतीय लोकतंत्र का यह नया स्वरूप दुनिया के सामने किस तरह उभरकर आता है।











