भारत-रूस के बीच ऐतिहासिक सैन्य समझौता लागू: 3000 सैनिक, युद्धपोत और विमानों की तैनाती को मिली मंजूरी

भारत और रूस की दशकों पुरानी रणनीतिक दोस्ती अब एक नए और अधिक शक्तिशाली चरण में प्रवेश कर चुकी है। दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक ‘रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स’ (RELOS) समझौते को अब आधिकारिक रूप से लागू कर दिया गया है, जिसके तहत दोनों देश एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग कर सकेंगे। रूस के आधिकारिक कानूनी पोर्टल पर प्रकाशित दस्तावेजों के अनुसार, इस समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे की सरजमीं पर एक ही समय में अधिकतम 3000 सैनिक, 5 युद्धपोत और 10 सैन्य विमान तैनात कर सकेंगे। यह व्यवस्था न केवल संयुक्त सैन्य अभ्यासों और प्रशिक्षण को सरल बनाएगी, बल्कि मानवीय सहायता और आपदा राहत जैसे महत्वपूर्ण अभियानों में भी दोनों सेनाओं के बीच तालमेल को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी। इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भारतीय सेनाओं को रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्रों और आर्कटिक के रणनीतिक बंदरगाहों जैसे व्लादिवोस्तोक और मरमंस्क तक सीधी पहुंच प्रदान करेगा।

यह समझौता भारत के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह भारतीय नौसेना और वायुसेना को रूस के व्यापक सैन्य बुनियादी ढांचे का उपयोग ईंधन भरने, मरम्मत और रसद आपूर्ति के लिए करने की अनुमति देता है। इससे भारत की हिंद महासागर से परे ‘ऑपरेशनल रीच’ यानी कार्यक्षमता में काफी विस्तार होगा। वहीं दूसरी ओर, रूस को भी हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए भारतीय बंदरगाहों और हवाई पट्टियों का लाभ मिल सकेगा। गौर करने वाली बात यह है कि यह समझौता आधिकारिक तौर पर 12 जनवरी 2026 से ही प्रभावी हो गया था, लेकिन इसके नियमों और सीमाओं से जुड़े विस्तृत दस्तावेज अब सार्वजनिक किए गए हैं। यह समझौता 5 वर्षों के लिए वैध रहेगा और बिना किसी आपत्ति के स्वतः ही अगले 5 वर्षों के लिए विस्तारित हो जाएगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘लॉजिस्टिक पैक्ट’ अमेरिका के साथ भारत के ‘लेमोआ’ (LEMOA) समझौते की तरह ही है, लेकिन इसे भारत और रूस की विशिष्ट रक्षा जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया है। वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, जहां पश्चिम एशिया और यूक्रेन के हालात तनावपूर्ण हैं, यह रक्षा करार भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है। इससे न केवल रूस निर्मित सैन्य उपकरणों के रखरखाव में आसानी होगी, बल्कि लंबी दूरी की तैनाती के दौरान भारतीय जहाजों को रसद के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। दोनों पक्ष हवाई क्षेत्र के उपयोग को सरल बनाने और एक-दूसरे के बंदरगाहों में जहाजों के प्रवेश की प्रक्रिया को सुगम बनाने पर भी सहमत हुए हैं। यह कदम साबित करता है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बावजूद नई दिल्ली और मॉस्को का भरोसा एक-दूसरे पर अडिग है और वे अपनी रक्षा साझेदारी को केवल खरीदार-विक्रेता के रिश्तों से ऊपर उठाकर एक गहरी सामरिक एकता में बदल रहे हैं।

 

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