बिहार की सियासत ने 15 अप्रैल 2026 को एक ऐसा मोड़ लिया, जिसकी कल्पना भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दशकों पहले जनसंघ के दौर में की थी। पटना के राजभवन में जब सम्राट चौधरी ने बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तो यह केवल एक व्यक्ति का राज्याभिषेक नहीं था, बल्कि राज्य में भाजपा के ‘जूनियर पार्टनर’ से ‘किंग’ बनने के लंबे संघर्ष की परिणति थी। बिहार के चार दशक के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार है जब भाजपा का कोई नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा है। इस ऐतिहासिक मुकाम तक पहुँचने के लिए पार्टी ने न केवल अपनी विचारधारा को जमीन पर उतारा, बल्कि सामाजिक समीकरणों की बिसात पर भी बड़ी कुशलता से अपनी चालें चलीं।
इस सफर की शुरुआत गठबंधन की उस राजनीति से हुई थी, जहाँ भाजपा ने लंबे समय तक नीतीश कुमार की अगुवाई वाले जनता दल (यूनाइटेड) के साथ ‘छोटे भाई’ की भूमिका स्वीकार की। पार्टी ने धैर्य के साथ अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया और धीरे-धीरे अपने आधार को सवर्णों की पार्टी की छवि से निकालकर पिछड़ों और अति-पिछड़ों के बीच विस्तारित किया। विशेष रूप से सम्राट चौधरी जैसे ओबीसी चेहरे को आगे बढ़ाना पार्टी की उस रणनीति का हिस्सा रहा, जिसने ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) समीकरण में सेंध लगाई। 2025 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का सबसे बड़े दल के रूप में उभरना इस बात का प्रमाण था कि अब बिहार की जनता नेतृत्व में बदलाव और सीधे भाजपा के शासन की ओर देख रही है।
नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा जाने का फैसला इस बदलाव के लिए अंतिम और निर्णायक साबित हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने बहुत ही सधे हुए तरीके से नेतृत्व परिवर्तन की यह जमीन तैयार की थी। पार्टी ने पहले सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, फिर उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी और अंततः उन्हें सूबे की कमान देकर यह स्पष्ट कर दिया कि अब बिहार में भाजपा किसी बैसाखी के सहारे नहीं बल्कि अपने दम पर खड़ी है। सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर भी काफी दिलचस्प रहा है; राजद और जदयू से होते हुए 2017 में भाजपा में शामिल होने वाले चौधरी ने बहुत कम समय में संगठन के भीतर अपनी विश्वसनीयता बनाई और आज वे उस मुकाम पर हैं जहाँ से वे बिहार के भविष्य की नई पटकथा लिखेंगे।
मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती बिहार को ‘बीमारू’ राज्य की श्रेणी से पूरी तरह बाहर निकालकर विकास की मुख्यधारा में लाने की है। शपथ ग्रहण के बाद उनके पहले संबोधन में ‘विकसित बिहार’ और ‘रोजगार’ पर जोर दिया गया, जो यह दर्शाता है कि अब पार्टी का ध्यान केवल राजनीति पर नहीं बल्कि सुशासन पर केंद्रित है। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य में भाजपा के अपने मुख्यमंत्री होने से ‘डबल इंजन’ की सरकार को लेकर लोगों की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। बिहार की गलियों में आज इस बात की चर्चा है कि क्या यह नया नेतृत्व राज्य की पुरानी समस्याओं जैसे पलायन और औद्योगिक पिछड़ेपन को दूर कर पाएगा। फिलहाल, भाजपा के लिए यह गौरव का क्षण है, क्योंकि जिस सत्ता के लिए उसने वर्षों इंतजार किया, वह आज उसके पास है।











